देहरादून: उत्तराखंड में वन्यजीवों की अवैध तस्करी के मामले अब केवल जंगलों और सीमावर्ती क्षेत्रों तक सीमित नहीं रह गए हैं। राजधानी देहरादून के शहरी इलाकों में भी संरक्षित और दुर्लभ वन्यजीवों की अवैध खरीद-फरोख्त के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। हाल के दिनों में पक्षियों से लेकर दुर्लभ कछुओं तक की तस्करी के मामलों ने वन विभाग की चिंता बढ़ा दी है।
सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वन्यजीवों को बेचने के लिए अब कथित तौर पर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया का भी सहारा लिया जा रहा है। ऐसे में विभाग को जमीनी स्तर के साथ-साथ डिजिटल माध्यमों पर भी निगरानी बढ़ानी पड़ रही है।
इंडियन स्पॉटेड ईगल को बेचने की कोशिश का मामला
ताजा मामला इंडियन स्पॉटेड ईगल की कथित अवैध बिक्री से जुड़ा है। वन विभाग को मुखबिर के जरिए सूचना मिली थी कि एक व्यक्ति दुर्लभ श्रेणी के इस पक्षी को बेचने की कोशिश कर रहा है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, इसे ऑनलाइन माध्यम से भी बेचने का प्रयास किया गया।
सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम ने कार्रवाई शुरू की और एक आरोपी को पकड़ लिया। अब विभाग इस बात की जांच कर रहा है कि यह संरक्षित पक्षी आरोपी तक कैसे पहुंचा और क्या इसके पीछे वन्यजीव तस्करों का कोई बड़ा नेटवर्क सक्रिय है।
देहरादून के डीएफओ वैभव कुमार के अनुसार, पूरे मामले की गहन जांच की जा रही है। विभाग यह पता लगाने का प्रयास कर रहा है कि संबंधित वन्यजीव कहां से लाया गया और इस गतिविधि में अन्य लोगों की भूमिका है या नहीं।
कुछ दिन पहले सैकड़ों तोतों की अवैध बिक्री का मामला
देहरादून में यह वन्यजीव तस्करी का पहला मामला नहीं है। कुछ समय पहले शहर में बड़ी संख्या में तोतों की कथित अवैध बिक्री का मामला भी सामने आया था। वन विभाग की कार्रवाई के दौरान तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था, जिन्हें बाद में जेल भेज दिया गया।
जांच में सामने आया था कि इन पक्षियों को लोगों को पालने के उद्देश्य से बेचा जा रहा था। यानी वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक आवास से निकालकर बाजार तक पहुंचाया जा रहा था। बड़ी संख्या में पक्षियों की बरामदगी ने वन विभाग के सामने तस्करी के संभावित नेटवर्क को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए थे।
दुर्लभ कछुओं की तस्करी के मामले भी आए सामने
देहरादून में वन्यजीवों की अवैध खरीद-फरोख्त केवल पक्षियों तक सीमित नहीं है। इससे पहले दुर्लभ प्रजातियों के कछुओं को अवैध रूप से ले जाने के मामले भी सामने आ चुके हैं।
इन घटनाओं ने वन विभाग के सामने कई सवाल खड़े किए हैं। आखिर संरक्षित वन्यजीव जंगलों और प्राकृतिक आवासों से निकलकर शहरों तक कैसे पहुंच रहे हैं? इनके खरीदार कौन हैं और इनके पीछे काम करने वाला नेटवर्क कितना बड़ा है? इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए विभाग जांच और निगरानी बढ़ा रहा है।
सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म बने नई चुनौती
वन्यजीव तस्करी के तौर-तरीकों में बदलाव ने जांच एजेंसियों के लिए नई चुनौती पैदा कर दी है। पहले जहां ऐसे मामले मुख्य रूप से जंगलों और सीमावर्ती इलाकों में सामने आते थे, वहीं अब शहरी क्षेत्रों में ऑनलाइन माध्यमों के जरिए भी संरक्षित प्रजातियों को बेचने की कोशिश की जा रही है।
इस कारण वन विभाग को अब मुखबिर तंत्र के साथ-साथ डिजिटल गतिविधियों पर भी नजर रखनी पड़ रही है।
वन विभाग ने बढ़ाई निगरानी
वन विभाग का मानना है कि देहरादून जैसे बड़े शहरी क्षेत्र में लगातार वन्यजीव तस्करी के मामले सामने आना गंभीर चिंता का विषय है। विभाग की ओर से संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने के साथ विशेष अभियान भी चलाए जा रहे हैं।
मुखबिर तंत्र को अधिक सक्रिय किया जा रहा है और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर संदिग्ध गतिविधियों की निगरानी भी बढ़ाई जा रही है। विभाग का उद्देश्य संरक्षित वन्यजीवों की अवैध खरीद-फरोख्त में शामिल लोगों और उनके संभावित नेटवर्क तक पहुंचना है।
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