विकासनगर: उत्तराखंड के जौनसार-बावर क्षेत्र में लोक संस्कृति और सदियों पुरानी परंपराएं आज भी लोगों को अपनी जड़ों से जोड़े हुए हैं।
इसी सांस्कृतिक विरासत की झलक कालसी ब्लॉक के उदपाल्टा और कुरौली गांवों में देखने को मिली
जहां पारंपरिक पाइंता पर्व के अवसर पर ग्रामीणों ने अनोखे गागली युद्ध का आयोजन किया।
अरबी के डंठलों से खेला जाने वाला यह युद्ध केवल एक रस्म नहीं
बल्कि पुरानी त्रासदी के पश्चाताप, आपसी भाईचारे और सामाजिक एकता का प्रतीक माना जाता है।
पर्व के दौरान दोनों गांवों के बुजुर्गों, युवाओं और महिलाओं ने उत्साह के साथ भाग लिया।
पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज, लोकगीतों और नृत्य के बीच ग्रामीणों ने अपनी सांस्कृतिक विरासत का प्रदर्शन किया।
इस आयोजन में हार-जीत से ज्यादा महत्व उस ऐतिहासिक घटना को याद करने का है
जिससे इस परंपरा की शुरुआत जुड़ी मानी जाती है।
ढोल-नगाड़ों की थाप पर क्याणी पहुंचे ग्रामीण
पाइंता पर्व के अवसर पर ग्रामीण सबसे पहले उदपाल्टा गांव के पंचायती आंगन में एकत्र हुए।
यहां से ढोल-नगाड़ों और रणसिंघे की धुन के बीच पारंपरिक जुलूस निकाला गया।
ग्रामीण अपने हाथों में गागली यानी अरबी के डंठल लेकर नाचते-गाते हुए क्याणी नामक स्थान पर पहुंचे।
इसी स्थान पर दोनों गांवों के बीच पारंपरिक गागली युद्ध खेला गया।
इस दौरान प्रतिभागियों ने एक-दूसरे पर अरबी के पत्तों और डंठलों से प्रतीकात्मक प्रहार किए।
आयोजन के बाद पंचायती आंगन में पुरुषों और महिलाओं ने पारंपरिक हारूल और तांदी नृत्य प्रस्तुत किया।
इससे पूरे क्षेत्र में लोक संस्कृति और सामूहिक उत्सव का माहौल बना रहा।
दो बहनों की दुखद कहानी से जुड़ी है परंपरा
खत के सदर स्याणा राजेंद्र सिंह राय ने गागली युद्ध के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व के बारे में जानकारी दी।
उनके अनुसार, इस परंपरा के पीछे रानी और मुन्नी नाम की दो बहनों से जुड़ी एक मार्मिक लोककथा प्रचलित है।
कहा जाता है कि दोनों बहनें एक दिन गांव से कुछ दूरी पर स्थित क्याणी के कुएं से पानी भरने गई थीं।
इसी दौरान रानी का पैर फिसल गया और वह कुएं में गिर गई।
मुन्नी ने घर लौटकर परिजनों को घटना की जानकारी दी
लेकिन परिवार के लोगों ने उस पर ही रानी को कुएं में धकेलने का आरोप लगा दिया।
खुद पर लगे इस गंभीर आरोप और मानसिक पीड़ा से दुखी होकर मुन्नी ने भी उसी कुएं में छलांग लगा दी।
इस तरह एक दुखद घटना में दोनों बहनों की जान चली गई। लोकमान्यता के अनुसार
बाद में जब परिजनों और ग्रामीणों को वास्तविक घटना का एहसास हुआ, तो उन्हें अपने आरोपों पर गहरा पश्चाताप हुआ।
पश्चाताप और स्मृति का प्रतीक है पाइंता पर्व
स्थानीय परंपरा के अनुसार, दोनों बहनों की स्मृति
और उस घटना से जुड़े पश्चाताप को जीवित रखने के लिए हर साल पाइंता पर्व मनाया जाता है।
पर्व से दो दिन पहले रानी
और मुन्नी की घास से बनी प्रतीकात्मक मूर्तियां तैयार की जाती हैं और उनकी पूजा की जाती है।
पर्व के दिन इन मूर्तियों को उसी कुएं तक ले जाकर विसर्जित करने की परंपरा बताई जाती है।
इसके साथ ही उदपाल्टा और कुरौली गांवों के ग्रामीण गागली युद्ध में भाग लेते हैं।
यह आयोजन पुरानी गलती को याद करने, अन्यायपूर्ण आरोपों के परिणामों से सीख लेने
और सामूहिक रूप से पश्चाताप व्यक्त करने का प्रतीक माना जाता है।
लोक संस्कृति को जीवंत रख रहा जौनसार-बावर
जौनसार-बावर अपनी विशिष्ट लोक परंपराओं, पारंपरिक वाद्ययंत्रों, लोकनृत्यों
और सामुदायिक आयोजनों के लिए जाना जाता है। पाइंता पर्व और गागली युद्ध इस क्षेत्र की ऐसी ही परंपराओं में शामिल हैं
जिनके माध्यम से स्थानीय समुदाय अपनी ऐतिहासिक स्मृतियों और सांस्कृतिक पहचान को अगली पीढ़ी तक पहुंचाता है।
उदपाल्टा और कुरौली के ग्रामीणों की भागीदारी दर्शाती है कि इन परंपराओं का महत्व केवल उत्सव तक सीमित नहीं है।
इनके पीछे सामाजिक संदेश, सामूहिक जिम्मेदारी और मानवीय संवेदनाओं की गहरी भावना भी जुड़ी हुई है।
नोट: रानी और मुन्नी की कहानी को स्थानीय लोककथा और परंपरा के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
इसके ऐतिहासिक विवरण की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध होने पर उसे अलग से शामिल किया जा सकता है।
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