Uttarakhand News : लेखन प्रतियोगिता में खुलासा; देहरादून तक नहीं लिख पा रहे दून के स्कूलों के बच्चे

विद्यालयों में आधुनिक शिक्षा और विदेशी भाषाओं पर बढ़ते जोर के बीच अब मातृभाषा हिंदी की स्थिति चिंता का विषय बनती जा रही है। हमारे बच्चों को अंग्रेजी, जर्मन और इटालियन जैसी विदेशी भाषाएं तो सिखाई जा रही हैं लेकिन वे हिंदी के सामान्य और आसान शब्द भी सही नहीं लिख पा रहे हैं।

RAIN WATER HARVESTING HD
आलम यह है कि केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) से संबद्ध विद्यालयों के बच्चे देहरादून भी गलत लिख रहे हैं। यह स्थिति किसी एक विद्यालय या एक बच्चे की नहीं है। विभिन्न स्कूलों के 90 फीसदी बच्चों का हाल कुछ ऐसा ही है। यह खुलासा अमर उजाला की ओर से देहरादून जिले के विभिन्न विद्यालयों में आयोजित लेखन प्रतियोगिता में हुआ है। बच्चों की लेखन सृजनात्मकता निखारने और रचनात्मक लेखन को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से अमर उजाला की ओर से डाक विभाग के साथ मिलकर विशेष अभियान के तहत लेखन प्रतियोगिता का आयोजन किया गया।

आठवीं से ग्यारहवीं के बच्चों की ओर से लिखे पत्रों को पढ़ने के दौरान यह सामने आया कि अधिकतर छात्र सरकार, वजह, स्कूल, उपाय, देहरादून, कारण, उत्तराखंड, शहर, मुझे, मैं, अखबार, अंदर, बहुत, निवासी, निवेदन, अपराध जैसे सामान्य शब्द भी सही नहीं लिख पा रहे हैं। आलम यह है कि बहुत से छात्र अपना नाम भी ठीक से नहीं लिख पा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि विद्यालयों में हिंदी विषय को उतनी प्राथमिकता नहीं दी जा रही जितनी अन्य भाषाओं को दी जा रही है। हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे आधुनिक और बहुभाषी बनें लेकिन वह मातृभाषा पर ही ध्यान नहीं दे पा रहे। इसलिए विद्यालयों में हिंदी लेखन, पाठन और व्याकरण पर विशेष कक्षाएं आयोजित की जानी चाहिए।

हिंदी बोलने पर लग रहा जुर्माना

यह हमारे समाज का दुर्भाग्य है कि आज भी अंग्रेजी बोलने में सक्षम होना लोगों के बौद्धिक स्तर को मापने की इकाई के तौर पर देखा जाता है। ऐसे में कुछ विद्यालय हिंदी बोलने पर जुर्माना लगाने से भी पीछे नहीं हट रहे। बच्चों ने बताया कि हिंदी बोलने पर उनसे 10, 15, 20 रुपये का जुर्माना वसूला जाता है। हिंदी बोलने पर बच्चों को अपराधी जैसा महसूस कराया जा रहा है।

पढ़ने की आदत से सुधरेगी हिंदी

एमकेपी पीजी कॉलेज की हिंदी विषय की विभागाध्यक्ष डॉ.अलका मोहन ने कहा कि रोज हिंदी के अखबार और किताबें पढ़ने की आदत डालनी चाहिए। कहानी, कविता और बाल साहित्य पढ़ने से शब्द भंडार बढ़ता है। नियमित लेखन अभ्यास भी बहुत जरूरी है। बच्चों को रोज एक पैराग्राफ या अपने अनुभव लिखने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। इससे उनकी वर्तनी और अभिव्यक्ति में सुधार आता है।

सिर्फ बच्चे नहीं, हम सब जिम्मेदार

इन हालात के जिम्मेदार सिर्फ बच्चे नहीं, बल्कि हम सब हैं। न तो विद्यालयों में शिक्षक हिंदी विषय को प्राथमिकता दे रहे हैं और न ही घर में अभिभावक ही इस पर ध्यान दे रहे हैं। न हम बच्चों को हिंदी के अखबार पढ़ने को प्रेरित कर रहे हैं और न हिंदी साहित्य… हम उनके अंग्रेजी समेत अन्य विदेशी भाषाएं फर्राटेदार बोलने पर ही खुश हैं। अगर हम आज से ही ध्यान देना शुरू कर दें तो स्थिति बदल सकती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *