विद्यालयों में आधुनिक शिक्षा और विदेशी भाषाओं पर बढ़ते जोर के बीच अब मातृभाषा हिंदी की स्थिति चिंता का विषय बनती जा रही है। हमारे बच्चों को अंग्रेजी, जर्मन और इटालियन जैसी विदेशी भाषाएं तो सिखाई जा रही हैं लेकिन वे हिंदी के सामान्य और आसान शब्द भी सही नहीं लिख पा रहे हैं।
हिंदी बोलने पर लग रहा जुर्माना
यह हमारे समाज का दुर्भाग्य है कि आज भी अंग्रेजी बोलने में सक्षम होना लोगों के बौद्धिक स्तर को मापने की इकाई के तौर पर देखा जाता है। ऐसे में कुछ विद्यालय हिंदी बोलने पर जुर्माना लगाने से भी पीछे नहीं हट रहे। बच्चों ने बताया कि हिंदी बोलने पर उनसे 10, 15, 20 रुपये का जुर्माना वसूला जाता है। हिंदी बोलने पर बच्चों को अपराधी जैसा महसूस कराया जा रहा है।
पढ़ने की आदत से सुधरेगी हिंदी
एमकेपी पीजी कॉलेज की हिंदी विषय की विभागाध्यक्ष डॉ.अलका मोहन ने कहा कि रोज हिंदी के अखबार और किताबें पढ़ने की आदत डालनी चाहिए। कहानी, कविता और बाल साहित्य पढ़ने से शब्द भंडार बढ़ता है। नियमित लेखन अभ्यास भी बहुत जरूरी है। बच्चों को रोज एक पैराग्राफ या अपने अनुभव लिखने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। इससे उनकी वर्तनी और अभिव्यक्ति में सुधार आता है।
सिर्फ बच्चे नहीं, हम सब जिम्मेदार
इन हालात के जिम्मेदार सिर्फ बच्चे नहीं, बल्कि हम सब हैं। न तो विद्यालयों में शिक्षक हिंदी विषय को प्राथमिकता दे रहे हैं और न ही घर में अभिभावक ही इस पर ध्यान दे रहे हैं। न हम बच्चों को हिंदी के अखबार पढ़ने को प्रेरित कर रहे हैं और न हिंदी साहित्य… हम उनके अंग्रेजी समेत अन्य विदेशी भाषाएं फर्राटेदार बोलने पर ही खुश हैं। अगर हम आज से ही ध्यान देना शुरू कर दें तो स्थिति बदल सकती है।