हरिद्वार: उत्तराखंड की धर्मनगरी हरिद्वार अपनी प्राचीन धार्मिक परंपराओं और सिद्धपीठों के लिए देशभर में प्रसिद्ध है।
यहां स्थित मां चंडी देवी मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है।
नील पर्वत पर बने इस मंदिर में सालभर भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं
लेकिन शारदीय नवरात्र के दौरान यहां विशेष रौनक देखने को मिलती है।
मां के जयकारों, पूजा-अर्चना और भजन-कीर्तन से पूरा मंदिर परिसर भक्तिमय हो उठता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां चंडी देवी अपने भक्तों की रक्षा करती हैं
और सच्चे मन से मांगी गई मनोकामनाएं पूरी करती हैं।
नवरात्र में श्रद्धालु मां के दरबार में पहुंचकर परिवार की सुख-समृद्धि, शांति और खुशहाली की प्रार्थना करते हैं।
शुंभ-निशुंभ और चंड-मुंड के वध से जुड़ी है मंदिर की कथा
मां चंडी देवी मंदिर का धार्मिक इतिहास देवी भगवती और राक्षसों के बीच हुए युद्ध की पौराणिक कथा से जुड़ा है।
मंदिर के पुजारी सुरजीत शर्मा के अनुसार, प्राचीन काल में शुंभ
निशुंभ और उनके सेनापति चंड-मुंड के अत्याचारों से देवता परेशान हो गए थे।
राक्षसों के बढ़ते प्रभाव के कारण देवताओं को अपना अधिकार भी गंवाना पड़ा था।
इसके बाद इंद्र सहित सभी देवताओं ने मां भगवती की आराधना की
और उनसे राक्षसों के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की।
धार्मिक कथा के अनुसार, देवताओं की पुकार सुनकर मां भगवती ने चंडी का रूप धारण किया
और शुंभ-निशुंभ के साथ चंड-मुंड का संहार कर देवताओं को संकट से मुक्त कराया।
नील पर्वत पर मां चंडी के विराजमान होने की मान्यता
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, राक्षसों का वध करने के बाद मां चंडी नील पर्वत पर विराजमान हुईं।
कहा जाता है कि देवताओं ने जनकल्याण के लिए मां से इसी स्थान पर निवास करने का अनुरोध किया था।
मान्यता है कि देवताओं की प्रार्थना स्वीकार कर मां यहां खंभ स्वरूप में विराजमान हो गईं।
मंदिर के पुजारी के अनुसार, यहां मां के रौद्र स्वरूप से जुड़ी मान्यता प्रचलित है।
वहीं, मंदिर में स्थापित पिंडी को मां के शांत स्वरूप का प्रतीक माना जाता है।
स्थानीय धार्मिक परंपरा के मुताबिक, आठवीं शताब्दी में आदिगुरु शंकराचार्य ने यहां पिंडी की स्थापना की थी।
चुनरी बांधकर मनोकामना मांगते हैं श्रद्धालु
मां चंडी देवी के दरबार में चुनरी बांधकर मन्नत मांगने की परंपरा भी प्रचलित है।
श्रद्धालु मंदिर में चुनरी अर्पित कर अपनी और अपने परिवार की खुशहाली के लिए प्रार्थना करते हैं।
मान्यता है कि मनोकामना पूरी होने पर भक्त दोबारा मंदिर पहुंचकर चुनरी खोलते हैं और मां के प्रति आभार व्यक्त करते हैं।
इसी आस्था के चलते उत्तराखंड के अलावा दूसरे राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
कोई परिवार में सुख-शांति की कामना करता है
तो कोई जीवन की परेशानियों से मुक्ति पाने के लिए मां के चरणों में शीश झुकाता है।
साढ़े तीन किलोमीटर की चढ़ाई के बाद होते हैं दर्शन
नील पर्वत पर स्थित मां चंडी देवी मंदिर तक पहुंचना श्रद्धालुओं के लिए धार्मिक यात्रा के साथ एक विशेष अनुभव भी है।
मंदिर तक पहुंचने के लिए लगभग साढ़े तीन किलोमीटर का पैदल पहाड़ी मार्ग तय करना पड़ता है।
श्रद्धालु माता के जयकारे लगाते हुए इस चढ़ाई को पूरा करते हैं।
जो भक्त पैदल चढ़ाई करने में असमर्थ हैं, उनके लिए उड़नखटोले यानी रोपवे की सुविधा भी उपलब्ध है।
मंदिर में भक्त मां को चुनरी, नारियल, फल और फूल अर्पित करते हैं।
नवरात्र के अवसर पर मंदिर में श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या मां चंडी देवी के प्रति लोगों की गहरी आस्था को दर्शाती है।
हरिद्वार आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह मंदिर प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है
जहां दर्शन कर भक्त आध्यात्मिक शांति और आशीर्वाद की कामना करते हैं।
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