उत्तरकाशी: उत्तरकाशी के ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्र में स्थित डोडीताल प्राकृतिक खूबसूरती के साथ धार्मिक आस्था का भी प्रमुख केंद्र है।
समुद्र तल से करीब 3,000 मीटर से अधिक ऊंचाई पर घने जंगलों
और हिमालयी चोटियों के बीच मौजूद शांत डोडीताल को स्थानीय लोग भगवान गणेश की जन्मभूमि मानते हैं।
यहां गणेश जी को ‘डोडीराजा’ के नाम से पूजा जाता है।
गणेश चतुर्थी के अवसर पर डोडीताल और आसपास के कैलासू क्षेत्र में विशेष धार्मिक आयोजन किए जाते हैं।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, इसी क्षेत्र में मां पार्वती ने गणेश को जन्म दिया था।
डोडीताल स्थित मां अन्नपूर्णा मंदिर से जुड़ी आस्था भी इस धार्मिक परंपरा को मजबूत करती है।
दस गांवों ने निकाली गणेश की शोभायात्रा
गणेश चतुर्थी के अवसर पर सोमवार को उत्तरकाशी की केलशू घाटी के 10 गांवों की ओर से गणेश महोत्सव की शुरुआत की गई।
कंडार देवता मंदिर से भगवान गणेश की भव्य शोभायात्रा निकाली गई।
ढोल-दमाऊं और रणसिंघे की गूंज के बीच शोभायात्रा विश्वनाथ मंदिर, मुख्य बाजार
बस अड्डे और भटवाड़ी रोड से होते हुए शहर के विभिन्न हिस्सों से गुजरी।
इस दौरान अगोड़ा, ढासड़ा, दंदालका, भंकोली, गजोली, नौगांव
सेकू और नाल्ड समेत आसपास के गांवों से पहुंचे ग्रामीणों ने पारंपरिक रासो-तांदी लोकनृत्य भी प्रस्तुत किया।
इस आयोजन में धार्मिक आस्था के साथ उत्तराखंड की पारंपरिक लोक संस्कृति की भी झलक देखने को मिली।
उबटन से गणेश को जन्म देने की मान्यता
स्थानीय मान्यता को स्कंद पुराण के केदारखंड में वर्णित गणेश जन्म की कथा से जोड़ा जाता है।
कथा के अनुसार, स्नान के लिए जाते समय मां पार्वती ने अपने शरीर के उबटन से एक बालक की रचना की
और उसमें प्राण डाल दिए। यही बालक आगे चलकर भगवान गणेश कहलाए।
मां पार्वती ने गणेश को द्वार पर पहरा देने और उनकी अनुमति के बिना किसी को अंदर प्रवेश न देने का आदेश दिया था।
इसी दौरान भगवान शिव वहां पहुंचे। गणेश ने माता की आज्ञा का पालन करते हुए उन्हें भी भीतर जाने से रोक दिया।
इसके बाद शिव और गणेश के बीच विवाद हुआ और भगवान शिव ने गणेश का सिर काट दिया।
पुत्र की स्थिति देखकर मां पार्वती क्रोधित हो गईं।
इसके बाद भगवान शिव ने गणेश को पुनर्जीवन प्रदान किया और उनके धड़ पर हाथी का सिर लगाया।
इसी कारण उन्हें गजानन के नाम से भी जाना जाता है।
स्थानीय ग्रामीण इस पौराणिक प्रसंग को डोडीताल से जोड़ते हैं
और इसी वजह से इस क्षेत्र को गणेश की जन्मभूमि के रूप में श्रद्धा से देखते हैं।
केदारखंड और ‘हिमगिरि विहार’ से जोड़ते हैं स्थानीय लोग
डोडीताल को गणेश जन्मभूमि मानने की परंपरा को स्थानीय लोग स्कंद पुराण के केदारखंड में वर्णित प्रसंगों से जोड़ते हैं।
उनके अनुसार, केदारखंड के अध्याय 10 में गणेश के प्रकृति से उत्पन्न होने का उल्लेख मिलता है
जबकि अध्याय 11 में गणेश पूजा और चतुर्थी से जुड़े प्रसंगों का वर्णन बताया जाता है।
स्थानीय मान्यता में डोडीताल को ‘डुंडीसर’ से भी जोड़ा जाता है।
इसके अलावा स्वामी तपोवन की पुस्तक ‘हिमगिरि विहार’ में भी डोडीताल की धार्मिक मान्यता से जुड़े संदर्भ होने की बात स्थानीय लोग बताते हैं।
कैलासू क्षेत्र के ग्रामीण पीढ़ियों से इस परंपरा को आगे बढ़ाते आ रहे हैं।
दस दिनों तक चलेगा गणेश महोत्सव
मां अन्नपूर्णा मंदिर डोडीताल के पुरोहित पं. संतोष खंडूड़ी के अनुसार
शोभायात्रा के बाद अगले 10 दिनों तक बेस कैंप अगोड़ा गांव में भगवान गणेश की विशेष पूजा-अर्चना होगी।
महोत्सव के अंतिम तीन दिनों में उत्तरकाशी जिले के अलग-अलग गांवों से देवडोलियां अगोड़ा पहुंचेंगी।
इस दौरान धार्मिक अनुष्ठानों के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे।
महोत्सव के अंतिम दिन देवडोलियों की मौजूदगी में अगोड़ा गांव की पवित्र धारा में गणेश प्रतिमा स्थापित की जाएगी।
लोकगीत में भी जीवित है डोडीताल की आस्था
डोडीताल की धार्मिक पहचान स्थानीय लोकगीतों में भी दिखाई देती है।
यहां प्रचलित पारंपरिक गीत ‘गणेश जन्मभूमि डोडीताल कैलासू, असी गंगा उद्गम अरू माता अन्नपूर्णा निवासू’ इस क्षेत्र की धार्मिक मान्यता को दर्शाता है।
स्थानीय लोगों के लिए डोडीताल केवल एक खूबसूरत हिमालयी झील नहीं
बल्कि भगवान गणेश की जन्मकथा और सदियों पुरानी लोक आस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है।
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