सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बिजली उत्पादन से होने वाले कार्बन उत्सर्जन की समस्या से निपटने के लिए सभी संबंधित पक्षों को एक साझा मंच पर आना होगा। कोर्ट ने ऊर्जा मंत्रालय को निर्देश दिया है कि वह केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) और केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग (सीईआरसी) के साथ संयुक्त बैठक बुलाकर इस दिशा में ठोस कार्ययोजना तैयार करे। कोर्ट का मानना है कि नीति निर्धारकों को जमीनी वास्तविकताओं से जोड़े बिना उत्सर्जन की चुनौती को दूर नहीं किया जा सकता।
यह निर्देश उस याचिका पर सुनवाई के दौरान आया जो नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के एक आदेश से संबंधित है। एनजीटी ने पर्यावरण मंजूरी देने से पहले जलवायु परिवर्तन संबंधी प्रभावों का मूल्यांकन करने की मांग को लेकर आदेश पारित किया था। इस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सीईए और सीईआरसी को मामले में पक्षकार बनाते हुए नोटिस जारी किया और ऊर्जा मंत्रालय को चार सप्ताह में योजना पर आधारित एक संयुक्त हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया।
जलवायु परिवर्तन को बताया वैश्विक संकट
सुप्रीम कोर्ट ने अपने 21 फरवरी 2025 के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन अब एक वैश्विक संकट बन चुका है, जो केवल पर्यावरणीय क्षरण तक सीमित नहीं है। इसका असर तापमान वृद्धि, अनियमित मौसम, बाढ़, सूखा और लू जैसे चरम मौसमी घटनाओं के रूप में सामने आ रहा है। कोर्ट ने कहा कि इस चुनौती से निपटने के लिए समन्वित प्रयास ज़रूरी हैं।
ऊर्जा क्षेत्र से 8% उत्सर्जन, निर्माण से 30%
कोर्ट में दाखिल अमीकस क्यूरी की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में कुल कार्बन उत्सर्जन में बिजली उत्पादन की हिस्सेदारी लगभग 8% है। वहीं, निर्माण स्थलों से 30%, फसल अवशेष जलाने से 3% और अन्य क्षेत्रों जैसे कचरा प्रबंधन से भी बड़ी मात्रा में उत्सर्जन होता है। केंद्र सरकार ने भी पर्यावरण मंत्रालय के जरिए कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल किया है, जिसमें बिजली उत्पादन से उत्सर्जन रोकने के लिए अब तक उठाए गए कदमों का उल्लेख किया गया है।
कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 19 अगस्त को तय की है और उम्मीद जताई है कि तब तक सभी पक्ष एक स्पष्ट कार्ययोजना लेकर सामने आएंगे। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में बिजली क्षेत्र में उत्सर्जन से जुड़े मानकों और नियमों को और कड़ा किया जा सकता है।