हे विधाता कन रुठि तू, त्वै तें दया भि नि आई… नदी के दूसरे छोर से अपने घरों को निहार रहे हर किसी व्यक्ति की जुबान पर बस यही बात थी। हर कोई यही कह रहा था कि जान तो बच गई लेकिन जीवनभर की खून-पसीने की कमाई उनके मकान खतरे की जद में है।
हे विधाता कन रुठि तू, त्वै तें दया भि नि आई… नदी के दूसरे छोर से अपने घरों को निहार रहे हर किसी व्यक्ति की जुबान पर बस यही बात थी। हर कोई यही कह रहा था कि जान तो बच गई लेकिन जीवनभर की खून-पसीने की कमाई उनके मकान खतरे की जद में है।